हमारे समाज मे प्राचीन काल से ही यह धारणा रही है कि शिवरात्रि के व्रत से अनेक प्रकार के लाभ व्रत करने वाले को प्राप्त होते है तथा शिवरात्रि के व्रत करने से मनोकामनाये भी शीघ्र पूरी हो जाती है।
आइये जानते है हमारे प्राचीन इतिहास को ओर जानते है शिवरात्रि पर शिवलिंग पूजा कैसे प्रारंभ हुई और शिवरात्रि पूजा से कितना लाभ प्राप्त होता है।
शिव लिंग की पूजा कैसे प्रारम्भ हुई?
शिव महापुराण {जिसके प्रकाशक हैं ‘‘खेमराज श्री कृष्णदास प्रकाशन मुंबई
(बम्बई), हिन्दी टीकाकार (अनुवादक) हैं विद्यावारिधि पंडित ज्वाला प्रसाद जी
मिश्र} भाग-1 में विद्यवेश्वर संहिता अध्याय 5 पृष्ठ 11 पर नंदीकेश्वर यानि शिव
के वाहन ने बताया कि शिव लिंग की पूजा कैसे प्रारम्भ हुई?
विद्यवेश्वर संहिता अध्याय 5 श्लोक 27.30 :- पूर्व काल में जो पहला कल्प
जो लोक में विख्यात है। उस समय महात्मा ब्रह्मा और विष्णु का परस्पर युद्ध
हुआ।(27) उनके मान को दूर करने को उनके बीच में उन निष्कल परमात्मा ने
स्तम्भरूप अपना स्वरूप दिखाया।(28) तब जगत के हित की इच्छा से निर्गुण शिव
ने उस तेजोमय स्तंभ से अपने लिंग आकार का स्वरूप दिखाया।(29) उसी दिन
से लोक में वह निष्कल शिव जी का लिंग विख्यात हुआ।(30)
विद्यवेश्वर संहिता पृष्ठ 18 अध्याय 9 श्लोक 40.43 :- इससे मैं अज्ञात
स्वरूप हूँ। पीछे तुम्हें दर्शन के निमित साक्षात् ईश्वर तत्क्षणही मैं सगुण रूप हुआ
हूँ।(40) मेरे ईश्वर रूप को सकलत्व जानों और यह निष्कल स्तंभ ब्रह्म का बोधक
है।(41) लिंग लक्षण होने से यह मेरा लिंग स्वरूप निर्गुण होगा। इस कारण हे पुत्रो!
तुम नित्य इसकी अर्चना करना।(42) यह सदा मेरी आत्मा रूप है और मेरी
निकटता का कारण है। लिंग और लिंगी के अभेद से यह महत्व नित्य पूजनीय है।(43)
विवेचन :- यह विवरण श्री शिव महापुराण (खेमराज श्री कृष्ण दास प्रकाश
मुंबई द्वारा प्रकाशित) से शब्दाशब्द लिखा है। इसमें स्पष्ट है कि काल ब्रह्म ने
जान-बूझकर शास्त्रा विरूद्ध साधना बताई है क्योंकि यह नहीं चाहता कि कोई
शास्त्रों में वर्णित साधना करे। इसलिए अपने लिंग (गुप्तांग) की पूजा करने को कह
दिया। पहले तो तेजोमय स्तंभ ब्रह्मा तथा विष्णु के बीच में खड़ा कर दिया। फिर
शिव रूप में प्रकट होकर अपनी पत्नी दुर्गा को पार्वती रूप में प्रकट कर दिया और
उस तेजोमय स्तंभ को गुप्त कर दिया और अपने लिंग (गुप्तांग) के आकार की
पत्थर की मूर्ति प्रकट की तथा स्त्रा के गुप्तांग (लिंगी) की पत्थर की मूर्ति प्रकट
की। उस पत्थर के लिंग को लिंगी यानि स्त्रा की योनि में प्रवेश करके ब्रह्मा तथा
विष्णु से कहा कि यह लिंग तथा लिंगी अभेद रूप हैं यानि इन दोनों को ऐसे ही
रखकर नित्य पूजा करना।
इसके पश्चात् यह बेशर्म पूजा सब हिन्दुओं में देखा-देखी चल रही है। आप
मंदिर में शिवलिंग को देखना। उसके चारों ओर स्त्रा इन्द्री का चित्रा है जिसमें
शिवलिंग प्रविष्ट दिखाई देता है। यह पूजा काल ब्रह्म ने प्रचलित करके मानव
समाज को दिशाहीन कर दिया। वेदों तथा गीता के विपरीत साधना बता दी।
आप जी ने ऊपर शिव पुराण भाग-1 में विद्यवेश्वर संहिता के पृष्ठ 11 पर
अध्याय 5 श्लोक 27.30 में पढ़ा कि शिव ने जो तेजोमय स्तंभ खड़ा किया था। फिर
उस स्तंभ को गुप्त करके पत्थर को अपने लिंग (गुप्तांग) का आकार दे दिया और
बोला कि इसकी पूजा किया करो। इस तरह की बकवाद तो शरारती बच्चा जो
पुराने समय में पशु चराता था, वह पाली किया करता जो वाद-विवाद में अन्य
बालक से कहता था कि ले मेरे इस (गुप्तांग) की धोक मार ले। यही दशा शिवलिंग
की पूजा बताने वाले काल ब्रह्म यानि सदाशिव की है जो ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव
जी के पूज्य पिता जी हैं।
चेतावनी :- वक्त है, अब भी संभल जाओ। नहीं तो मानव जीवन का अवसर।
हाथ से जाने के पश्चात् रोने के अतिरिक्त कुछ नहीं रहेगा। गीता व वेदों का ज्ञान
परम अक्षर ब्रह्म का बताया हुआ है। इसलिए वह प्रमाणित व लाभदायक है।
आप देखें यह शिव लिंग का चित्रा :-
इस शिवलिंग की पूजा अंध श्रद्धावान करते हैं जो शर्म की बात तो है ही,
परंतु धर्म के विरूद्ध भी है क्योंकि यह गीता व वेद शास्त्रों में नहीं लिखी है।
इसका खण्डन सूक्ष्मवेद में इस प्रकार किया है कि :-
वाणी :- धरै शिव लिंगा बहु विधि रंगा, गाल बजावैं गहले।
जे लिंग पूजें शिव साहिब मिले, तो पूजो क्यों ना खैले।।
शब्दार्थ :- परमेश्वर कबीर जी ने समझाया है कि तत्वज्ञानहीन मूर्ति पूजक
अपनी साधना को श्रेष्ठ बताने के लिए गहले यानि ढ़ीठ व्यक्ति गाल बजाते हैं यानि
व्यर्थ की बातें बड़बड़ करते हैं जिनका कोई शास्त्रा आधार नहीं होता। वे जनता को
भ्रमित करने के लिए विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पत्थर के शिवलिंग रखकर अपनी
रोजी-रोटी चलाते हैं।
कबीर जी ने कहा है कि मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि यदि शिव जी के
लिंग को पूजने से शिव जी भगवान का लाभ लेना चाहते हो तो आप धोखे में हैं।
यदि ऐसी बेशर्म साधना करनी है तो खागड़ (व्गत्रडंसम ब्वू) के लिंग की पूजा
कर लो जिससे गाय को गर्भ होता है। उससे अमृत दूध मिलता है। हल जोतने के
लिए बैल व दूध पीने के लिए गाय उत्पन्न होती है जो प्रत्यक्ष लाभ दिखाई देता
है। आपको पता है कि खागड़ के लिंग से कितना लाभ मिलता है। फिर भी उसकी
पूजा नहीं कर सकते क्योंकि यह बेशर्मी का कार्य है।
इससे स्पष्ट है कि आप अंध श्रद्धावानों को यही नहीं पता है कि यह पत्थर
का बना शिवलिंग व जिसमें यह प्रविष्ट दिखाया है, यह क्या है? यदि आपको पता
होता तो इसको एक आँख भी नहीं देखते, पूजा तो बहुत दूर की कौड़ी है।
कबीर, पत्थर पूजें हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार।
तातें तो चक्की भली, पीस खाए संसार।।
बेद पढ़ैं पर भेद ना जानें, बांचें पुराण अठारा।
पत्थर की पूजा करें, भूले सिरजनहारा।।
शब्दार्थ :- किसी देव की पत्थर की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करते हैं जो
शास्त्राविरूद्ध है। जिससे कुछ लाभ नहीं होता। कबीर परमेश्वर ने कहा है कि यदि
एक छोटे पत्थर (देव की प्रतिमा) के पूजने से परमात्मा प्राप्ति होती हो तो मैं तो
पहाड़ की पूजा कर लूँ ताकि शीघ्र मोक्ष मिले। परंतु यह मूर्ति पूजा व्यर्थ है। इस
(मूर्ति वाले पत्थर) से तो घर में रखी आटा पीसने वाली पत्थर की चक्की भी
लाभदायक है जिससे कणक पीसकर आटा बनाकर सब भोजन बनाकर खा रहे हैं।
वेदों व पुराणों का यथार्थ ज्ञान न होने के कारण हिन्दू धर्म के धर्मगुरू पढ़ते
हैं वेद, पुराण व गीता, परंतु पूजा पत्थर की करते तथा अनुयाईयों से करवाते हैं।
इनको सृजनहार यानि परम अक्षर ब्रह्म का ज्ञान ही नहीं है। उसको न पूजकर
अन्य देवी-देवताओं की पूजा तथा उन्हीं की काल्पनिक मूर्ति पत्थर की बनाकर पूजा
का विधान लोकवेद (दंत कथा) के आधार से बनाकर यथार्थ परमात्मा को भूल गए
हैं। उस परमेश्वर की भक्ति विधि का भी ज्ञान नहीं है।





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