जन्माष्टमी का व्रत कितना लाभदायक❓
गीता अध्याय 6 श्लोक 17 का सारांश :- दुःखों का नाश करने वाला योग यानि भक्ति तो
शास्त्रानुकूल साधना करने से सिद्ध होगी अर्थात् वह पूर्ण मोक्ष प्राप्ति की साधना तो यथायोग्य
आहार-विहार करने वाले की दैनिक कार्य करते-करते भक्ति करने वाले की तथा यथायोग्य सोने
तथा जागने वाले की ही सिद्ध होती है।(6ध्17)
।। पूर्ण परमात्मा प्राप्त करने की विधि व व्रत निषेध की जानकारी।।
विचार करें :-- अध्याय 6 के श्लोक 16 का सारांश :- इसमें स्पष्ट किया है कि व्रत (खाना न
खाने वाले) से योग साधना सिद्ध नहीं होती है अर्थात् व्रत की पूर्ण मनाही की है और अधिक खाना
भी मना है, अधिक सोना व जागना भी साधक की साधना में बाधक है।
अध्याय 6 श्लोक 20 का अनुवाद है कि मन रोकने की (योग अभ्यास) साधना करते हुए जब
{(उपर मते) अर्थात् पहले वर्णित शास्त्रानुकूल मत (विचार) के अनुसार साधना करने से मत का
भाव है कि शास्त्रानुकूल साधना पूर्ण संत से उपदेश ले कर गुरु मर्यादा में रहते हुए केवल एक पूर्ण परमात्मा पर अटल विश्वास के साथ आधारित रहना। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से रहित
होना। यह मत (राय-सलाह) कही है।} निश्चल हो जाता है उस स्थिति में (आत्मना) आत्म ज्ञान
के द्वारा (आत्मनाम) अपनी जीव स्थित को देख कर अर्थात् जान कर (आत्मनि) अपने पूर्ण
परमात्मा की भक्ति में संतुष्ट हो जाता है अर्थात् जीव तथा आत्मा को एक स्थिति में जानता है जैसे
बर्फ और जल की स्थिति है। चूंकि जल से ही बर्फ बनी है ऐसे ही आत्मा ही जीव बनी है जब तक
बर्फ है उसमें पानी वाले गुण नहीं हैं। इसी प्रकार बर्फ-बर्फ है, पानी-पानी है। यदि कोई कहे बर्फ ही
पानी है वह सही जानकार नहीं है। यदि कोई कहे जीव ही ब्रह्म अर्थात् परमात्मा है वह अल्पज्ञ है।
बर्फ से पानी बनाया जाए तब पानी वाले गुण आएंगे। इसी प्रकार जीव से ब्रह्म बनाया जाएगा तब वह ब्रह्म यानि परमात्मा जैसे गुण वाला अविनाशी आत्मा होगा।
सार :- अध्याय 6 के श्लोक 16 से 32 में कहा है कि अन्न-जल सोने-जागने का संयम करके
यानि ठीक-ठीक खाए-पीए, जागे-सोवे, ऐसे रहकर पूर्ण परमात्मा के कभी समाप्त न होने वाले आनन्द (पूर्ण मुक्ति) को प्राप्त करने के लिए शास्त्रा के अनुसार नियमित साधना करनी चाहिए। पूर्ण गुरु की खोज करें जो पूर्ण परमात्मा का मार्गदर्शक हो। फिर निष्कपट छलरहित भाव से व पूर्ण
आस्था से निश्चल मन से आत्म तत्व को तथा जीव के दुःख को याद रख कर पहले (उपरमते) दिए
विवरण अनुसार जैसा जो यज्ञ नहीं करता वह पापी-चोर है। यज्ञ भी गुरु के द्वारा शास्त्रों में वर्णित
विधि से (मतपरः) मतानुकूल (मतावलम्बी) भाव से करें। पूर्ण परमात्मा की भक्ति पूर्ण मुक्ति
(परम-गति) व परम शांति दे सकती है। जो साधक परमात्मा और जीव की स्थिति सही तरह जान
लेता है वही पूर्ण मुक्ति प्राप्त करता है। जो प्राणी काल (ब्रह्म) के आधीन हैं वे काल (ब्रह्म) को
भगवान मानते हैं। काल (ब्रह्म) का उन पर पूरा दायित्व है। जो साहेब कबीर हंस हैं वे काल से
बाहर हैं। इसलिए कहा कि जो मुझ काल को भजते हैं वे मुझे सर्वस्वा मानते हैं तथा वे प्राणी भी मेरी
नजरों से दूर नहीं हैं अर्थात् मैं (काल) उन पर पूरी नजर रखता हूँ भावार्थ है कि जो काल उपासक
ब्रह्म की साधना करता है वह काल (ब्रह्म) के जाल में ही रहता है जो पूर्ण परमात्मा का भजन करता
है वह काल जाल से बाहर है। साधना करने वाले साधक के लिए मन के द्वारा इन्द्रियों को वश
करके साधना सफल मानी है अन्यथा नहीं।
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